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बुड़बुड़ में शर्मसार शिक्षा : 30.85 लाख का स्कूल बना पर शौचालय- किचन शेड नही, बरसात में बंद हो जाता है मिड डे मील, जंगल की ओर भाग रही बेटियां*

बुड़बुड़ में शर्मसार शिक्षा : 30.85 लाख का स्कूल बना पर शौचालय- किचन शेड नही, बरसात में बंद हो जाता है मिड डे मील, जंगल की ओर भाग रही बेटियां*

0 बुड़बुड़ के बच्चों का प्रशासन से सीधा सवाल- क्या हमारी जान और इज्जत की कोई कीमत नही?

 

0 पंचायत चाहती तो 15वें वित्त से शौचालय- किचन शेड बन जाता लेकिन मुखियाओं को भी बच्चों की नही पड़ी चिंता.

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*कोरबा/पाली:-* डीएमएफ के 30.85 लाख खर्च कर ग्राम बुड़बुड़ में प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला का भवन तो बन गया, लेकिन प्रशासन के साथ- साथ पंचायत जिम्मेदारों ने भी सबसे जरूरी चीजें शौचालय और किचन शेड बनाना उचित नही समझा। इससे जंगली इलाके में स्थित स्कूल के छात्र- छात्राएं शौच के लिए जंगल की ओर भागने को मजबूर हैं और बरसात में मिड डे मील भी नही बन पा रहा है।

 

शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले बुड़बुड़ स्कूल में आज न इज्जत सुरक्षित है, न पेट। पंचायत में 30.85 लाख खर्च से प्राथमिक- माध्यमिक शाला का निर्माण कराया गया, जो सरपंच- सचिव के धन लिप्सा की चाह में भ्रष्ट्राचार की भेंट चढ़ गया और नवीन भवन के बनने के बाद पहली हल्की बारिश से ही छत सीपेज होकर टपकने लगा, समीप कोयला खदान में होने वाली ब्लास्टिंग से दीवारें हिलने लगी है। दूसरी ओर स्कूल जंगल मे है, भवन में शौचालय नही बना है। इस कारण विशेषकर छात्राओं को शौच के लिए झाड़ियों और जंगल की ओर जाना पड़ रहा है। वर्तमान में बरसात का मौसम है और जहरीले कीड़े- मकोड़ों का प्रकोप बढ़ गया है। अब सवाल यह उठता है कि अगर जंगल मे किसी छात्रा को सांप- बिच्छू ने काट लिया या कोई अनहोनी हो गई तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? शिक्षकों का कहना है कि हर पल डर लगा रहता है कि किसी बच्चे के साथ कोई घटना न हो जाए। इसी तरह स्कूल में किचन शेड का निर्माण भी नही कराया गया। मजबूरी में मटेरियल सामाग्री रखने के लिए बनाए गए अस्थायी शेड में ही मध्याह्न भोजन पकाने वाले समूह को खाना बनाना पड़ रहा है। चारो ओर से खुला होने के कारण शेड के भीतर बरसाती पानी घुसता है, इससे आग नही जल पाती, बर्तन भी भीग जाते है। नतीजतन कई बार भोजन ही नही बन पाता और बच्चे मिड डे मील से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में भूखे पेट शिक्षा की कल्पना कैसे संभव है? इस समस्या के समाधान को लेकर यदि सरपंच- सचिव चाहते तो 15वें वित्त आयोग की राशि से शौचालय और किचन शेड का निर्माण करा सकते थे, लेकिन उन्होंने बच्चों के मूलभूत जरूरतों पर पैसा खर्च करना जरूरी नही समझा और 15वें वित्त की राशि से पेयजल स्रोतों के कामों में बोर खनन, सबमर्सिबल पंप- पानी टंकी कार्य पर कागजों में दिलचस्पी दिखाई, जबकि पंचायत में पहले से पेयजल व्यवस्था सुदृढ़ थे और खदान द्वारा ग्राम को खनन कार्य के लिए अधिग्रहित करने के बाद पंचायत द्वारा बुनियादी आवश्यकता वाले कामों को छोड़ विकास के कोई काम नही कराने थे, फिर भी सरकारी राशि मनमाने फूंकी गई। प्रशासन ने लाखों की स्वीकृति दी और पंचायत मुखियाओं द्वारा स्कूल भवनें तो बनवा दी गई लेकिन बच्चों की सुरक्षा को अनदेखा किया गया। इसे देखते हुए शिक्षकों ने अपनी मेहनत से शौच के लिए साड़ी से अस्थायी घेराव किया है, लेकिन यह पूर्ण समाधान नही है। आंधी- बारिश में साड़ी उड़ जाती है और बेटियां फिर बेबस हो जाती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कमीशन के खेल में स्कूल का घटिया निर्माण तो हुआ ही, पर शौचालय व किचन शेड निर्माण की ओर किसी ने ध्यान नही दिया, क्या यही बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ है। ऐसे में स्वाभाविक है कि शिक्षा पर लाखों खर्च करने के बाद भी अगर बेटियां को शौच के लिए जंगल जाना पड़े तो इस विकास का आखिर क्या फायदा। बुड़बुड़ के बच्चे आज प्रशासन और पंचायत से सिर्फ एक सवाल पूछते हैं- *क्या हमारी जान और इज्जत की कोई कीमत नही?*

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